तीर्थन घाटी की यात्रा Part 3

हिमाचल की और प्रस्थान

मित्रों……तय कार्यक्रम के अनुसार 22 जून शनिवार को मैंने ग़ाज़ियाबाद में अपने घर से ऑफिस के लिए निकलते समय अपने कपडे, मोबाइल चार्जर, बच्चों और पत्नी के लिए जैकेटस और कुछ खाने पीने के सामान साथ में रख लिया और दोपहर को 2 बजे गुडगाँव से सीधा ही लुधियाना के लिए रवाना हो गया.

दिल्ली के चारो ओर एक्सप्रेस पेरिफेरल हाईवे बनने से यह सुविधा हो गयी है की आप कभी भी चाहे तो पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की और यात्रा आरम्भ कर सकते हैं आपको दिल्ली के भारी भरकम ट्रैफिक से होकर निकलने के आवश्यकता नहीं है.

ग़ाज़ियाबाद या गुडगाँव से लुधियाना तक का लगभग 350 किलोमीटर का सफर मैंने कई बार 5 घंटे में तय किया है …. बिलकुल अकेले ड्राइव करो तो और भी जल्दी पहुंचा जाता है … बस कार में अपना मनपसंद संगीत बज रहा हो ….. मेरा रिकॉर्ड टाइम है लुधियाना से सुबह चार बजे चल कर मात्र 4 घंटे 10 मिनट में यानी 8:10 बजे तक ग़ाज़ियाबाद अपने घर तक पहुँचने का जो की 2018 में किसी दिन रविवार को लुधियाना से वापिस आते समय का एक्सपीरियंस है.

इस बार का सफर भी अच्छा रहा….. शाम 7 बजे तक लुधियाना पहुंचे और रात्रि में ससुराल सत्कार का आनंद लिया. फिर जब साथ ले जाने वाले सामान को देखा तो एक बार तो चक्कर आ गए …. 5 बड़े बड़े बैग और अनगिनत छोटे छोटे बैग. दरअसल पत्नी और बच्चे पिछले 37 दिन से यहीं पर थे सो उनका सब सामान….बच्चों को ननिहाल से उपहार स्वरुप मिले खिलौने सब कुछ पैक था…. इसके अलावा एक बैग मैं अभी और लाया था जिसमें मेरे कपडे, लैपटॉप और बच्चों के जैकेट्स थे.

अपने साथ समस्या यह है की कार में CNG सिलेंडर लगा होने के कारण कर की डिग्गी में कुछ सामान नहीं आ पता सिवाय कुछ एक छोटे मोटे सामान के. वैसे हर बार हम ज्यादातर लम्बे सफर में बैग्स गाडी की बैक सीट के सामने रख कर बैग्स और सीट पर कम्बल इत्यादि बिछा कर बच्चों के लिए एक लेटने योग्य जगह तैयार कर देते हैं और बाकी सामान को कार कि छत पर कैरियर पर बाँध लेते हैं परन्तु इस बार सामान कुछ ज्यादा ही हो गया था और मैं भी सामान को कार कि छत पर रखने से थोड़ा हिचक रहा था क्युकी पहाड़ी इलाके का सफर था

अब हमारे पास 3 विकल्प थे …..

हला विकल्प … सिर्फ जरूरत का सामान लेकर जाएं और वापसी में लुधियाना से बाकी सामान उठाते हुए ग़ाज़ियाबाद जाएं.
दूसरा विकल्प ….. कि कुछ सामान यहीं छोड़ दें और फिर कभी ले जाएं.
तीसरा विकल्प कि …. बड़े बड़े बैग्स को छत पर बाँध दें और बाकी छोटा सामान कार के अंदर रखें.

पहले विकल्प के लिए मैं राज़ी नहीं था क्युकी यह पूरे एक अतिरिक्त दिन का काम था ….. दुसरे विकल्प पर बच्चे नहीं मान रहे थे …… अब अपने पास तीसरे विकल्प को अपनाने के सिवा कोई चारा नहीं था …. ना… ना करते हुए भी चार य्ये भारी भारी बैग्स को छत पर रख कर नायलॉन कि रस्सी से कस कर बाँध लिया……हालांकि छत पर बैग्स रखने के कारण एक स्थान पर विवाद भी हुआ और मुझे पुलिस खर्चा भी भरना पड़ा जिसका विवरण मैं आगे के भाग में है.

रविवार सुबह 6 बजे हम लुधियाना से रवाना हो गए ….. गूगल मैप्स के रुट अनुसार मुझे लुधियाना से दोराहा (लगभग बीस किलोमीटर) तक जा कर फिर नहर के किनारे किनारे सड़क तक रोपड़ तक जाना था परन्तु मैंने एक तीस एक किलोमीटर का स्लिप रुट लिया क्युकी मुझे लुधियाना-चंडीगढ़ रोड पर “खमाणों” से CNG रिफिल करवानी थी… हालांकि यह CNG मेरे काम वापिसी में आनी थी.

क्रमशः

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