तीर्थन घाटी की यात्रा Part 2

समय और दूरी की कैलकुलेशन

“गूगल देवता” से तीर्थन घाटी के बारे में पूछा तो पता चला कि यह स्थान लुधियाना से लगभग 300 किलोमीटर दूर है और हमारे रुट से बिलकुल ही अलग है …. वहां से वापिस घर तक का रास्ता और 500 किलोमीटर है यानी कि लगभग 450 किलोमीटर अतिरिक्त यात्रा होगी (क्युकी वैसे भी मुझे लुधियाना से ग़ाज़ियाबाद लगभग 350 किलोमीटर यात्रा तो करनी ही थी)

अब बजट का हिसाब लगाया तो कैलकुलेट किया कि 450 किलोमीटर अतिरिक्त यात्रा का खर्च (मात्र ईंधन खर्च) आएगा लगभग 2000-2500 क्युकी मेरे पास CNG वाली कार है और जहाँ जहाँ गैस मिल जाये अपने को 2-3 रूपये प्रति किलोमीटर खर्च पड़ता है …. इस रुट पर हालांकि CNG तो नहीं मिलनी थी पर फिर भी अगर एक सिलेंडर मंडी गोबिंदगढ़ से भर कर रिज़र्व रखते (पहाड़ पर CNG से गाडी नहीं चल पाती) और उसको वापिसी में खर्च करते तो भी 2000 -2500 का ही अतिरिक्त खर्च आता … तो यह यात्रा अपने को आने-जाने के खर्च को लेकर तो ठीक-ठाक लग रही थी.

दूसरा प्रश्न था कि यह जगह रहने-खाने के हिसाब से किस बजट में आएगी ….. फिर से “गूगल देवता” से सहायता ली परन्तु कुछ तसल्लीदायक परिणाम नहीं मिला …. बच्चो को जून महीने के अन्त तक वापिस आना था और एक सप्ताह का समय था अपने पास से कुछ और अध्ययन किया “तीर्थन घाटी” के बारे में परन्तु फिर भी कुछ अधिक जानकारी मिल नहीं पायी सिवाय इसके कि यह एक “अछूता स्थान” है जिसके बारे में अधिकतर लोग नहीं जानते …. इसके अलावा यह भी पता चला कि यह एक “Lazy प्लेस” है जहाँ अधिक कुछ करने को नहीं है ….. एक्टिविटी या हो-हल्ला तो भूल ही जाइये .

हिसाब लगाया कि यदि यहाँ पर ज्यादा कुछ करने को नहीं है तो इसका मतलब यहाँ पर लोगबाग भी काम ही आते होंगे और लोगबाग यदि काम आते हैं तो इस स्थान पर अधिक महंगाई भी नहीं होनी चाहिए …… पर्यटन स्थलों का सीधा सा गणित हैं जितने अधिक लोग उतना महंगा सब-कुछ अब वो चाहे होटल कमरा भाड़ा हो या खाना-पीना या शॉपिंग हो.

खैर ….. मैने Ajit Singh दद्दा और Neeraj Kumar जी से संपर्क साधने का प्रयास किया …. अजित जी का फ़ोन नंबर तो मेरे पास था और एकाध बार व्हाट्सप्प पर हेलो-हाई भी हो चुकी थी …..नीरज जी का मेरे पास कांटेक्ट नंबर नहीं था सो अजित जी से व्हाट्सप्प और नीरज जी से फेसबुक मेसेंजर पर कुछ जानकारी लेनी चाही …… प्रयुत्तर पोसिटिव मिला …… पता चला कि इन दोनों ने सांझे में महीने भर के भाड़े पर कमरा ले रखा है जिसमे स्वयं खाना पकाने कि सुविधा भी है और 25 रूपये प्रति किलो में ताज़ा दूध लेकर ये लोग खूब मजे से खा पी रहे हैं.

मैंने अपने सब संशय “रहने का क्या प्रबंध होगा, कहाँ पर पहुंचना है, पहुँच कर निराशा तो नहीं होगी ना, , फ़ैमिली लायक जगह है ना, कमरा तो मिल जायेगा ना” आदि-आदि सब प्रश्न अजित जी को व्हाट्सप्प पर पूछने शुरू किये …. हालांकि उन्होंने संक्षिप्त उत्तर दिए परन्तु रिस्पांस पॉज़िटिव था ….. अजित जी के व्हाट्सप्प पर एक वाक्य “आ_जाओ….सब_हो_जाएगा” ने सब संशय ख़त्म कर दिए और अपन ने अपना प्रोग्राम फाइनल कर दिया.

अजित जी और नीरज जी से गूगल लोकेशन मांगी और निर्णय कर लिया कि शनिवार को घर से गुडगाँव अपने ऑफिस जाऊँगा और शाम कुछ जल्दी निकल कर लुधियाना पहुँच जाऊंगा ….. फिर अगले दिन रविवार को जितनी जल्दी हो सके सब बोरी-बिस्तर बाँध कर गाडी में लोड करके लुधियाना से ससुराल से विदा लेकर आगे निकल लेंगे और शाम होने से पहले पहले गंतव्य पर पहुँच लेंगे.

गूगल मैप पर लुधियाना से कुल साढ़े आठ घंटे कि ड्राइव का अनुमान दिख रहा था ….. रुट बन रहा था लुधियाना से दोराहा फिर वहां से नहर के साथ साथ चलते हुए रोपड़ (रूपनगर) फिर वहां से किरतपुर साहिब (किरतपुर साहिब से हिमचल प्रदेश कि सीमा और पहाड़ी इलाका शुरू होता है) फिर वहां से हिमाचल में प्रवेश कर के बिलासपुर, सुंदरनगर, मंडी होते हुए आगे तक.

गूगल मैप का साढ़े आठ मतलब अपना कम से कम बारह घंटे….क्यूँकि साथ में छोटे बच्चे हैं तो रुकना-चलना लगा रहेगा……सुबह छह बजे चलना पड़ेगा ताकि शाम को अँधेरा होने से पहले पहले गंतव्य तक पहुँच जाएं.

क्रमशः

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