पूस परंपरा और पीठा

यह स्पेशल रेसिपी भेजी है श्वेता चंचल जी ने हज़ारीबाग़, झारखण्ड से.

जितनी शानदार उनकी यह रेसिपी है उतना ही शानदार उनके लिखने का अन्दाज़ भी है.

#श्वेता_जी_की_पोस्ट

बचपन से देखते आ रही हूँ इस पारंपरिक व्यंजन के लिए घर के प्रत्येक सदस्य के मन में उत्साह व विशेष प्रेम ..

तब हम नानी के घर रहा करते थे , मेरी नानी पारंपरिक खाने की चीजों को बनाने में बहोत निपुण भी थी साथ ही बहोत ही प्रेम से सारी चीजों की तैयारी भी करती थी ..

#पौराणिक_विधि

वो समय था जब गैस चुल्हे का प्रचलन ज्यादा नहीं हुआ था और ना ही मिक्सर ग्राइंडर ,
तो उस समय मिट्टी के चूल्हे और सिलबट्टे से ही बीस पच्चीस सदस्यों के लिए खाने की तैयारी की जाती थी ..

और बात जब पीठे की हो तो उसकी तैयारी दो दिन पहले से करनी होती थी, नानी कहती थी कि पूस में पीठा खाने का चलन है हमारे यहाँ, एक तो सर्दी की कंपकंपाती रातें , दिन तो शुरु होते ही खत्म सा हो जाता था , और कनकनाती ठिठुरती लंबी रातें शुरु …

तो हाँ, इस समय नए धान कूटे जाते हैं, बस उन्हीं नई फसलों से बनने वाले ये पारंपरिक व्यंजन हैं, पीठे के लिए मोटे अरवा चावल को धोकर पतले सूती कपड़े में पानी को निथार कर धूप में सूखाया करते थे ,जिससे पानी चावल सोख लेता था और अतिरिक्त पानी सूख जाता था, पूरे दिन यही प्रक्रिया चलती थी , फिर दुसरे दिन सिलबट्टे में थोड़ा थोड़ा पीसा जाता था, चावल के आटे बनाए जाते थे …

अब जाकर मुख्य सामग्री चावल तैयार होता था ..

#भरावन_के_लिए … – फिर जिस दिन बनाना होता था उस दिन सुबह चने की दाल पानी में भिगोई जाती थी , फिर उसे भी सिलबट्टे पर ही पीसा जाता था , बिल्कुल पेस्ट के जैसा पीसा होना चाहिए था …साथ ही इसमें स्वाद के लिए लहसुन पीस कर और लहसुन के पत्ते, सुआ पत्ता , धनिया पत्ता, थोड़ी हल्दी , कटा अदरख और थोड़ा नमक बनाकर ये भरावन की सामग्री तैयार कर ली जाती थी …

#चावल_के_आटे_को_गूँथने_की_प्रक्रिया ..

इन सब तैयारियों के होते ही चूल्हे जलाए जाते थे , बड़े भगोने में पानी गर्म किया जाता था , और थोड़े तेज गर्म पानी के साथ चावल के आंटे को थोड़े तेल की सहायता से साना जाता था, बिल्कुल रोटी वाले आंटे की तरह , नर्म व मुलायम , यह बेहद जटिल प्रक्रिया होती थी पीठे को बनाने की , फिर भी उत्साह में थकावट दूर ही भाग जाता था …

हम सब बच्चे नानी को घेरकर बैठ जाते थे , देखते थे पूरी प्रक्रिया , और बारी बारी से यह भी पूछ डालते थे सब , पीठा कब मिलेगा ….

#भरने_की_प्रक्रिया – नानी जो दोनों हाथों में तेल चुपड़कर चावल के आटे के गोले बना रही होती थी , और माँ – मौसी सब मिलकर उसमें चने दाल की पीसी भरावन को भरकर आटे को बंद कर रखती जाती थी..हल्का पानी मुहाने पर लगाकर दोनों साइड को चिपका दिया जाता था ..

फिर , अब जहाँ एक ओर अदहन (उबलने के लिए रखा गया पानी ) तैयार होता था उस बड़े भगोने में सूती कपड़ा बाँधा जाता था , क्योंकि ये पीठा ठीक इडली की तरह भाप से पकता है, और उस समय इडली स्टैंड नॉर्थ में ज्यादा प्रचलन में नहीं हुआ करता था …

तो उबलते हुए पानी के भगोने में उस सूती कपड़े को बाँध कर सारे भरे हुए पीठे को रखा जाता था , और उसे किसी बड़े बर्तन से ढँक कर पकने के लिए छोड़ दिया जाता था …

जबतक पीठा पकता था , तबतक नानी हमें ढेर सारी कहानियाँ सुना देती थी , और हम पीठे और भूख दोनों को संतुलित करते हुए कहानी पर ध्यान लगाते थे …

करीब बीस पच्चीस मिनट में एक खेप पीठा तैयार हो जाता था, और जब यह पीठा को आंच से उतारा जाता था तो हम सब बच्चों को वहाँ बुलाया जाता था ताकि पीठे पके हुए भाप को हम सेंक सकें, कहते हैं

“पीठा फटे, हाथ पैर ना फटे” ,

जैसा कि पता हो कि इन सर्दियों में हाथ पैर फटते हैं और यह पारंपरिक उपाय था उस समय अपने हाथ पर व चेहरे पर गर्म भाप सेंकते थे ताकि हमारी त्वचा खुष्क ना हो सके …वहूं पीठे का फटना उसके पूर्णतः पक जाने का सबुत हुआ करते हैं ..

तो अब जाकर गरमा गरम पीठा तैयार होता था , लहसुन की चटनी और आलू – टमाटर सुआ पत्ते वाली तरकारी के साथ इसका आनंद ही अनंत होता है ..

मुझे नहीं पता यह पीठा का प्रचलन और किन किन स्थानों पर है , पर मोमो वगैरह इसकी ही श्रेणी में कहे जा सकते हैं….

फिलहाल अब सारी सुविधाएँ मौजुद हैं इस पारंपरिक चीज को बनाने के लिए , स्वाद और अपनापन आज भी वही ..

बाकि तो यह धरोहर है ये सब पुरानी तकनीकें, नानी से माँ , और माँ से मुझ तक.

मित्रों…..आज रविवार की छुट्टी को इस विशेष झारखन्डी डिश के साथ एंजॉय कीजिए…..रेसिपी का आनंद उठाइए….आप भी बनाइए और अपने मित्रों के साथ भी शेयर कीजिए 🙏

आपका अपना…..#पारुल_सहगल_साथी 😊

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